तुम मेरी रहगुज़र मेरी मंज़िल भी
मेरा सफ़ीना मेरा साहिल भी
तुम रास्ते का क़याम हो
थके मन का इल्हाम हो
दोपहर में बरगद का रूप हो
शाम की ठंडी सिमटी धूप हो
ख़त हो बशीर का या ग़ज़ल मीर की
कलमा इक़बाल का या बरकतें फ़क़ीर की
तुम मेरी नज़्मों में हो ग़ज़लों में
शब्दों के ख़ुशबूदार कँवलों में
सफ़हे पे फैला तबस्सुम हो
तुम मेरी ख़ामोशी का तरन्नुम हो
क्या मुझ में बाकी मैं हूँ
या मुझ में सिर्फ़ तुम हो …
लब हैं या दो मिसरे शेर के
आँखें हैं या ज़ख़ीरे कुबेर के
बदन की तराश है समंदर सी
चाल है या कोई लहर कहर सी
तुम हो जलपरी मेनका या मोहिनी
हो अप्सरा या आरज़ू बेहिसाब सी
तुम मेरे सहरा में सराब हो
क़बा-ए-गुलाब हो
उम्र के साथ जो जवाँ हो
वो देरीना शराब हो
हो सजदा या मेहराब हो
हाय, शादाब हो या कोई ख़्वाब हो
क्या मुझ में बाकी मैं हूँ
या मुझ में सिर्फ़ तुम हो …
तुम मेरी सहर का अज़ान हो
ख़ुदा का बख़्शा फ़रमान हो
मेरा मज़हब मेरी रिवायत हो
मेरी पूजा मेरी इबादत हो
मेरी शिद्दत में बसा जुनून हो
रगों में बह रहा जो वो सुकून हो
तुम हो हर रक़्स में
हर शख़्स में हर अक्स में
तुम गूँजती हो फ़िज़ाओं में
हर कोशी में हर दिशाओं में
तुम मेरी कल्पनाओं में हो
और उनकी प्रेरणाओं में हो
कहाँ कहाँ नहीं होती हो
आजकल तुम हर जगह होती हो
जब तुम नहीं होती हो
तब सबसे ज़्यादा होती हो
तुम ही बताओ जानम
क्या मुझ में बाकी मैं हूँ
या मुझ में सिर्फ़ तुम हो …