मुझे कभी कभी सिगरेट
पीने की आदत है
शांत एकाकी नुक्कड़ पे
सवाली निगाहों से दूर
उँगलियों के बीच से
एक लम्बी कश
और साँसों के साथ छोड़ देता हूँ मैं
कुछ धुँधले सफ़ेद धुएँ
कानों से गुज़रती हैं
सुगबुगाती तम्बाकू की आवाज़ें
तल्ख़ी आती है ज़बां पे
फुंकता है कलेजा
होंठ भी थोड़े सुलग जाते हैं
पर दिल-ओ-दिमाग़ को
शिफ़ा मिल जाती है
फेफड़े मख़मली हो जाते हैं
और ढीली पड़ जाती हैं
ज़ेहन की उलझी कसी नसें
आज भी सिगरेट पी ली मैंने
सिगरेट थी या तुम, पता नहीं
वही एक लम्बी कश
और साँसों के साथ छोड़ दिए मैंने
कुछ बीते पल, और
कुछ धुँधली सफ़ेद यादें …..