इश्क़ क्या है

कौन कहता है ज़मीं मिलेगी इश्क़ को
कुछ हवा सा रहना भी इश्क़ है

ज़रूरी तो नहीं की इज़हार हो बातों का
कुछ आँखों से कह देना भी इश्क़ है

हाँ बेरंग सी होती हैं सूनी बाँहें मगर
उन्हें सोच के सुर्ख़ हो जाना भी इश्क़ है

इश्क़ वैसा तो नहीं जो फ़िल्मों में दिखाया गया
कुछ दुनियादारी कुछ उलझनों का होना भी इश्क़ है

धड़कनों के शोर में तमाम शब सिर्फ़ जागना नहीं
उनके एहसास तले सुकून से सोना भी इश्क़ है

इश्क़ में होते हैं अक्सर हादसे
कुछ समझ ना आना भी इश्क़ है

माना इश्क़ को है रौशनी से इशरत
पर अंधेरों में पास बैठना भी इश्क़ है

ना हुआ पूरा तो क्या इश्क़ ना होगा
कुछ अधूरा सा रहना भी इश्क़ है

कोई उम्मीद नहीं शिकवे-शिकायतें नहीं
जानम! तुम्हारा बस साथ होना ही इश्क़ है

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