सिर्फ़ तुम

तुम मेरी रहगुज़र मेरी मंज़िल भी मेरा सफ़ीना मेरा साहिल भी तुम रास्ते का क़याम हो थके मन का इल्हाम हो दोपहर में बरगद का रूप हो शाम की ठंडी सिमटी धूप हो ख़त हो बशीर का या ग़ज़ल मीर की कलमा इक़बाल का या बरकतें फ़क़ीर की तुम मेरी नज़्मों में हो ग़ज़लों में…Read more सिर्फ़ तुम

काला चश्मा

अब्र सरीखे नूरानी चेहरे पे कमसिन कमली काला चश्मा है जिस्म में तराश समंदर की चाँद की परछाई काला चश्मा लटों को समेटता कभी होंठों को छूता कितना खुशनसीब तेरा काला चश्मा रातें लुट गईं आशिक़ों की दिन में निकला जब काला चश्मा इश्क़ परस्तों की आह नज़र पासबाँ-ए-हुस्न है काला चश्मा ग़ज़ाल आँखें भी…Read more काला चश्मा

पशेमानी

कभी मेरी भी मजबूरियाँ समझ गए होते तो ये हिजाब-ए-दरमियाँ समझ गए होते नश्तर सिर्फ़ तुम्हारे ही दिल पे नहीं चला था कभी मेरी भी गली से तुम गुज़र गए होते दूर कहीं निकल गए हम देरीना रस्ते पे मैं तो नासमझ थी तुम ही पलट गए होते नज़र बचा कर लौट गए कल महफ़िल…Read more पशेमानी

Travel Diary #8.2 : Roopkund – Strolling in a dream

Journey began here. And it continues henceforth ... Day 4 – Bedni Bugyal to Pathar Nachauni Leaving the Bedni camp site was not easy for me. I used to look back after every 15-20 steps so that I can etch the view in my heart for eternity. The trail disappeared into a saddle in the…Read more Travel Diary #8.2 : Roopkund – Strolling in a dream

Travel Diary #8.1 : Roopkund – Strolling in a dream

Nestled comfortably in my 3 BHK apartment amidst a concrete jungle, I dreamt of deep virgin forests. I dreamt of luscious aroma of rain-soaked leaves, vast expanse of alluring meadows, blue rippling brooks, wondrous stretch of rugged meandering terrains and unconfined snowy flanks. I dreamt of waking up in breathtaking camp sites, seeing picturesque villages…Read more Travel Diary #8.1 : Roopkund – Strolling in a dream

Hope

चलो मुस्कुराने की वजह ढ़ूँढ़ते हैं ज़िंदगी तुम हमें हम तुम्हें ढ़ूँढ़ते हैं ख़ानाबदोशी में उलझें हैं सारे रहगुज़र इस सिफ़र में कोई सफ़र ढ़ूँढ़ते हैं कितना शोर है माज़ी के सियाह जंगल में एक नई सहर कोई नई ग़ज़ल ढ़ूँढ़ते हैं भटक रहे हैं कब से अब्र के टुकड़े सा बरस जाएँ कहीं वो…Read more Hope

यूँ सर-ए-आम …

यूँ सर-ए-आम मत लो अँगड़ाई, कल अख़बार में जाने कितने घायल मिलेंगे अपनी लरज़ती कमर के जो बिखेरती हो  क़रीने तुम्हारी गलियाँ तो आबाद बाक़ी शहर बरबाद मिलेंगे समेट लो दराज़ काकुल फिर से धूप कर दो दीद-ए-आफ़ताब की रातों को सहर मिलेंगे कोई ख़त में अपने होंठों के दो महकते चाँद दे दो तुम्हारे आशिक़ रात…Read more यूँ सर-ए-आम …

तुम…कल फिर आना

तुम...कल फिर आना मेरी कल्पनाओं की प्रेरणा बन कर किसी सफ़हे पे बिछ जाना या मात्राएँ बन कर मेरे टूटे शब्दों को पिरो देना तुम...कल फिर आना तुम किसी अलंकार में छुप कर बैठ जाना या किसी विराम-चिन्ह की बाँहों में सांसें लेना या फिर सानी मिसरे में घुल कर मेरे गज़ल का संगीत बन…Read more तुम…कल फिर आना

कितनी बातें …

सफीना-ए-शब के बादबाँ सी बातें मेरी समंदर, तुम्हारी किनारों की बातें हर शाम आयत सी हर दिन रमज़ान का मेरी रोज़े की, तुम्हारी इफ्तार की बातें वो घाट किनारे धीमी आँच पे पकती मेरी बटर-चिकन, तुम्हारी इडली-साम्भर की बातें मैं अल्साई सुबह की उबासी तुम दोपहर की इन्क़लाबी तूतियाँ मेरी जगजीत, तुम्हारी हनी सिंह की बातें…Read more कितनी बातें …

Travel Diary #7 : Road trip to Medak and Warangal

It has been a while since I wrote about my adventures. Between Rajasthan and this, there has been an enthralling drive to Srisailam, unwinding Horsley Hills and exquisite Coorg. My mundane commitments didn’t allow me to describe those thrills. But here I am; back.   Atishay got a car of his own, Mohit was in…Read more Travel Diary #7 : Road trip to Medak and Warangal