तुम...कल फिर आना मेरी कल्पनाओं की प्रेरणा बन कर किसी सफ़हे पे बिछ जाना या मात्राएँ बन कर मेरे टूटे शब्दों को पिरो देना तुम...कल फिर आना तुम किसी अलंकार में छुप कर बैठ जाना या किसी विराम-चिन्ह की बाँहों में सांसें लेना या फिर सानी मिसरे में घुल कर मेरे गज़ल का संगीत बन…Read more तुम…कल फिर आना
Poetry
कितनी बातें …
सफीना-ए-शब के बादबाँ सी बातें मेरी समंदर, तुम्हारी किनारों की बातें हर शाम आयत सी हर दिन रमज़ान का मेरी रोज़े की, तुम्हारी इफ्तार की बातें वो घाट किनारे धीमी आँच पे पकती मेरी बटर-चिकन, तुम्हारी इडली-साम्भर की बातें मैं अल्साई सुबह की उबासी तुम दोपहर की इन्क़लाबी तूतियाँ मेरी जगजीत, तुम्हारी हनी सिंह की बातें…Read more कितनी बातें …
Mamihlapinatapai
सकुचा के बैठ जाती है मेरी बगल वाली सीट पे वो भूरे बालों वाली लड़की ….. नज़रों का contact होता है कभी smile भी transact होता है Heart rate साला spike होता है लेकिन conversation नहीं strike होता है सच में road के दुसरी तरफ देखती है या कनखी से मुझे देखा करती है कोई…Read more Mamihlapinatapai
परवाज़ – 2
इक परिंदा उड़ चला है आज आसमां नापने हदों को अपनी हौसलों को थोड़ा और तराशने कह रहे हैं संगी-साथी, “कैसे अकेला जाएगा ? रास्तों की सुध नहीं, क्या ख़ाक मंज़िल पाएगा !” बोला वो खुद से, सपनों पे डर की लगाम न लगने दे एड़ मार, घोड़े को खंदक के पार हो जाने दे…Read more परवाज़ – 2
बेटी की विदाई
एक उबासी सर्दी के पौ फटे आई एक बुलबुल मेरे आँगन में अपनी किलकारी कल्लोल से रंग भर दिया मेरे कोरे सपनों में तुतला कर बोलती थी जब जब कानों में रस टपकता था नन्हे पैरों में पायल की छनछन से श्रुतियों का आलाप छलकता था नाज़ुक है, शोख़ है, संभाल कर रखना इसे आपको…Read more बेटी की विदाई
बेबस माँ
भूखे पेट देखता रहा वो आसमां को पर आज सिर्फ चाँद ही बेल पाती है माँ बेटे ने कहा “माँ मुझे दूध पीना है” फटे कलेजे से उसे आँसू पिलाती है माँ भयंकर आग लगी है एक पेट में चूल्हे में अपना खून जलाती है माँ आँखें धँस गयीं हैं कटोरे में सपन-सलोने दिखा के…Read more बेबस माँ
बेख्वाबी
अब रातें बेरंग सी लगने लगी हैं ना कहीं वो सियाह सुकून ना तो वो टिमटिमाते सितारे मेरे सहर का गीला पैराहन भी सूख गया है ना गुलों की खुशबू है ना गुलफाम ना शबनमी सुबह ना कस्तूरी शाम सुना है कि तुमने इन सब से अपने बालों का जूड़ा बना लिया है ...
बवंडर
एक बवंडर आया है शहर में उड़ा कर लिए जा रहा है शब्दों को मात्राएँ बिखरी पड़ी हैं उखड़े पेड़ों की तरह सरेआम बर्बादी का मंज़र है जर्द बेजान सफहों में लिपटी ये ज़मीं ये उजड़े हुए आशियाने स्याही सनी हुई है धूल में बिलखते मासूम मिसरे ढूंढ रहे हैं अपने अशारों को न कहीं…Read more बवंडर
परवाज़
वो दूर उफुक़ पर दिखी उसे एक नज़्म आबशारों के तरन्नुम सी कानों में टपकी एक नज़्म मारे खुशी के झूम उठा वो सोचा कि- बड़े दिनों बाद प्यास बुझेगी बड़े दिनों बाद जिस्म फिर सरसब्ज़ होगा लब फड़क रहे थे खुशी से हौसले सरसोर थे संभाल नहीं पा रहा था सुरूर-ए-मंज़िल को…Read more परवाज़
रात पश्मीने की
यूँही कभी-कभार आ जाती हो मिलने तुम, ये जानते हुए भी कि तुम्हें चले जाना है फिर भी तुम आई मिलने कल रात संगमरमरी रेत पर लेटे रहे हम दोनों रात की पश्मीनी चादर ओढ़े, कोहरा लहराता रहा जिस्म पे सरेआम खुशबू की तरह, उस सुलगते चाँद की रोशनी में जिसे मैं फूँक-फूँक कर जला…Read more रात पश्मीने की