लाखों झमकें खिड़की के बाहर जगमगाती थीं
अदा ये शोख़ दिवाली की हमें खूब भाती थी
बीड़ी बम, अनार, रस्सी, रॉकेट, चटाई
शकरपारे, लड्डु, चमचम, बर्फी मिठाई
कितने उमंग कितने उल्लास से घर सजाते थे
पटाखों को दो दिन पहले धूप में सुखाते थे
दीदी के साथ थर्मोकोल के सुंदर घरौंदे बनाना
लई और तीसी के तेल से हाथ सन जाना
लावा मूढ़ी सतंजे का स्वाद बहुत लुभाता था
कुलिया-चुकिया में खाने का अंदाज़ गुदगुदाता था
बाज़ार से ‘शुभ-लाभ’ वाले स्टिकर लाते थे
माँ के साथ दरवाज़े पे रंगोलियाँ बनाते थे
घर के बड़ों में पच्चीसी की बाज़ी लगती थी
हम छोटों में तो लूडो के पासे पे ठनती थी
हर एक देहरी पे झिलमिल दीप जलता था
अमावस पे पूरनमाशी का आलोक छलकता था
आज खिड़की के बाहर ना दिये हैं ना बल्बों की लड़ी
ना चरखियों पे उछलते कूदते बच्चे ना फुलझड़ी
सड़क किनारे बस एक खंभा बोल रहा है
सन्नाटा ओढ़े यहाँ सारा शहर सो रहा है
कुछ करने की चाह में कहाँ निकल आए
कितना पाया कितना खोया हिसाब नहीं लगा पाए
ज़रूरतों के पीछे कहीं खो गए हम रेले में
कितना काफ़ी था हम भूल गए इस मेले में
आज एक साल और बीत गया, एक कड़ी और टूट गई
मेरा घर पीछे रह गया, आज एक दिवाली और छूट गई …